Saturday, June 20, 2020

मनुष्यता किस ओर

मनुष्य  खुद को सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना कहता रहा है और खुद पर इतराता रहा है । उसे हमेशा लगा है कि धरती पर उससे महत्वपूर्ण कुछ नहीं है और प्रकृति की सारी संपदा उसी के लिए है । लेकिन मनुष्य का आपसी भाईचारा क्या इतना मजबूत इतना निस्वार्थ और इतना सार्वभौमिक है । क्या यह सब इतना व्यापक है कि मनुष्य के द्वारा मनुष्य के शोषण को रोक सके । क्या कुछ मनुष्यों की धन लोलुपता, भोग विलास की अनंत आकांक्षा में मनुष्य जाति को भी अन्य जीव और निर्जीव साधनों की तरह उत्पादन के एक साधन के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है । क्या मनुष्य के द्वारा मनुष्य का शोषण उसकी उस तथाकथित आध्यात्मिक चेतना को चोटिल नहीं करता है जो हर मनुष्य को ईश्वर का प्रतिरूप मानती है । क्या हम ऐसे विश्व में सुख का अनुभव कर सकते हैं जहां कोई भूखा हो दुखी अशांत हो और जीवन जीने के लिए होने वाली मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा करने की स्थिति में ना हो । भारत जैसे गरीब देशों में जहां संसाधनों की कमी और जरूरतों में भारी असंतुलन है जहां मनुष्य द्वारा मनुष्य के आर्थिक शोषण के लिए कई सामाजिक और धार्मिक जातिय  व्युरचनाएं की गई है। वहां इस तरह के शोषण से मुक्त हो पाना और भी मुश्किल हो गया है।

धनी पश्चिमी देशों द्वारा दुनिया भर में अपनी पूंजीवादी लूट के बाद अकूत संपदा एकत्र की गई है और लगातार लूटी जा रही है उससे वहां के नागरिकों को आर्थिक राजनीतिक रूप से अधिक सबल समर्थ और सामाजिक सुरक्षा से युक्त बना दिया है और उनकी भोजन और अन्य  शारीरिक आवश्यकताओं की दौड़ उतनी श्रम साध्य और थकाऊ नहीं रह गई है। इसी कारण अमीर देशों के नागरिक गरीब देशों की नागरिकों की तुलना में मानव के उच्चतर मूल्यों, नैतिकता और मनुष्य के जीवन के प्रति अधिक संवेदनशील नजर आते है। 

क्या आज का मनुष्य  जीवन के उच्चतर मूल्यों जैसे प्रेम, दया, भाईचारा और सह अस्तित्व को पाने के स्थान पर निम्नतम मूल्य धन संपदा लालच और वासना को अधिक महत्व नहीं दे रहा है । बाजारवाद ने पूरी दुनिया में लूट भ्रष्टाचार व्यभिचार को स्वीकृति दिलाने में और दुनिया में निम्नतम मूल्यों की स्थापना करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है । आदिम मनुष्य इन अर्थों में कहीं अधिक सभ्य था और जीवन की उत्कृष्टता को कहीं बेहतर तरीके से समझता था । क्या बाजार हमारे अपने जीवन को इस तरह से नहीं बदल रहा है कि हम सिर्फ इस व्यवस्था में उत्पादन के साधन या उपकरण हो गए हैं क्या बाजारवाद हमें सिर्फ उपभोक्ता के रूप में नहीं देखता है । मनुष्य अपने जीवन के उच्चतर मूल्यों से दूर होता जा रहा है धन और पद की जो अंधी दौड़ है वह मनुष्य के जीवन को और अधिक कठिन और दूषित करता रहा है क्या ऐसी कोई व्यवस्था की जरूरत नहीं है जो हमें अधिक मानवीय है अधिक दयालु और अधिक प्रेम से भरा हुआ बना सके । यह संभव नहीं है कि दुनिया में कोई दुखी हो और आप सुखी हो और आनंद का अनुभव कर सकें । मनुष्य की चेतना गहराई में एक दूसरे से जुड़ी हुई है और दुखी मनुष्य की चेतना आपकी चेतना को भी दुखी और दुख से भर देगी इसलिए दुनिया भर में तरह-तरह के नशों के द्वारा अपनी चेतना को भुलाने की कोशिश की जा रही है । मनुष्यता के उच्च स्तर मूल्यों की स्थापना के लिए आवश्यक है कि मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की उपलब्धता को आसान बना दिया जाए निजी संपत्ति को इकट्ठा करने की होड़ को समाप्त कर दिया जाए । एक नया साम्यवादी समाज बनाया जाए जहां पूरी मनुष्यता गैर बराबरी और शोषण से मुक्त हो सके ताकि मनुष्य अपने जीवन में उच्चतर मूल्यों की स्थापना कर सकें और पूरी दुनिया प्रेम दया और सहिष्णुता के साथ अस्तित्व में बनी रह सके ।

Friday, May 8, 2020

भारत के मजदूर आंदोलन का भविष्य

भारत में मजदूर आंदोलनों का कोई बहुत स्वर्णिम इतिहास नहीं रहा है। दुनिया के अन्य देशों जैसे फ्रांस, रूस अमेरिका आदि देशों में मजदूर आंदोलनों ने देशों की राजनीतिक सत्ता को ही बदल दिया ।  रूस में वोल्शेविक क्रांति ने तो राजनीतिक व्यवस्थाओं को ही बदल कर रख दिया । दुनिया में मजदूर आंदोलनों की शुरुआत 1760 से 1840 कीऔद्योगिक क्रांति के बाद उत्पन्न हुई मजदूरों एवं किसानों के शोषण की पृष्ठभूमि में हुई । सरकारों द्वारा शोषणकारी वर्गों के हित साधने वाली नीतियां बनाने के विरोध में मजदूर आंदोलनों की शुरुआत हुई । कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के लेखो और उनके रचित साहित्य ने मजदूर  आंदोलनों को एक स्पष्ट वैचारिक आधार दिया । हमारे देश में सर्वप्रथम श्री एम एस एस बंगाली के द्वारा सन 1875 में एक संगठन बनाकर मजदूरों के कार्यस्थल की परिस्थितियों, वेतन सुविधाओं मे सुधार आदि के लिए प्रयास शुरू किया गया | इनको ही हम  भारत में मजदूर आंदोलनों का जन्मदाता मान सकते हैं। श्री मेघजी लोखंडे ने बांबे प्रेसिडेंसी मिल मे  1881 में बांबे मिल हाथ कामगार एसोसिएशन की स्थापना की। यह एक तरह से मजदूर हितों की लड़ाई के लिए भारत में पहला संगठित प्रयास था । भारतीय रेल कर्मचारियों ने भी एक भारतीय रेल एकीकृत सोसाइटी के नाम से एक संगठन सन 1897 में बना लिया । स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर में सक्रिय नेताओं का रवैया मजदूर आंदोलन के प्रति उदासीनता भरा हुआ था । इसका कारण मजदूर आंदोलनों का समाजवादी विचारधारा का होना और साम्राज्यवादी विरोधी सोच थी जो अभी अपनेपहले चरण में ही था। यह नेता ब्रिटिश सरकार से किसी भी प्रकार की सीधी लड़ाई से बचना चाहते थे |  ब्रिटिश सरकार ने शुरुआती मजदूर आंदोलनों के प्रभाव से 1881 और 1891 में बाल मजदूरी के रेग्युलेशन , कार्य के घंटो मे कमी  और कार्यस्थल की परिस्थितियों को लेकर कुछ नियम तय किए थे । उस समय आंदोलनरत राष्ट्रीय नेताओं ने ब्रिटिश सरकार की यह कहकर आलोचना की कि वह ब्रिटिश उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए और इन अधिनियमों को लागू कर रही है। यह भारतीय उद्योगपतियों के हित में नहीं  है । राष्ट्रीय नेताओ मे सिर्फ बाल गंगाधर तिलक ही मजदूर हितो को लेकर चितित थे अन्य नेताओ का रवैया मजदूरो के  हित मे नही था |  ब्रिटिश भारत में मजदूरों की पहली संगठित हड़ताल सन् 1899 मैं तब हुई जब  ग्रेट इंडियन पेनिनसुला   (रेलवे )में कार्यरत मजदूरों ने कम मजदूरी और कार के अधिक घंटों के कारण हड़ताल कर दी। इस तरह देखा जाए तो भारतीय रेल के श्रमिकों को भारतीय मजदूर आंदोलन का नेतृत्व करता माना  जा सकता है । भारतीय रेल के मजदूरों में आपातकाल के दौरान जेपी आंदोलन में भी बहुत बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और बहुत प्रभावशाली भूमिका निभाई । मजदूरों को भी हम संगठित और असंगठित दो मुख्य क्षेत्र में बांट सकते हैं इसमें सरकारी क्षेत्र और निजी क्षेत्र के मजदूर, मानसिक श्रम करने वाले अध्यापक और क्लर्क तथा शारीरिक श्रम करने वाले कारखाना मजदूर  तक मे विभाजित कर सकते हैं | भारत का मजदूर आंदोलन मूलत: संगठित क्षेत्र के मजदूरों का ही आंदोलन रहा है। एक अनुमान के मुताबिक देश की कुल संपत्ति 50 करोड़ के करीब है इसमें से 90% श्रमिक असंगठित क्षेत्रों से आते हैं ।असंगठित क्षेत्र के मजदूर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का नेतृत्व चाहते हैं लेकिन खुद को उनके साथ जोड़ना उन्हें पसंद नहीं  है । संगठित क्षेत्र के मजदूर खुद को मजदूर की जगह कर्मचारी या इंप्लाइज कहलाना पसंद करते हैं । अब जबकि 1991 की नई आर्थिक नीतियों के प्रभाव में लगातार श्रम सुधारों के नाम पर पूंजीपतियों के हित में और मजदूर विरोधी नीतियां बनाई जा रही है। वेतन भोगी नियमित कर्मचारियों की भर्ती करने की जगह ठेका (कॉन्ट्रैक्ट) सिस्टम से मजदूरों से काम कराया जा रहा है | संगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या लगातार घटाई जा रही हैं और संगठित क्षेत्र के मजदूरों का काम लगातार असंगठित क्षेत्र में भेजा जा रहा है तब इन हालातों में संस्थानिक मजदूर संगठन अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं | मजदूर संगठनों में भी जातिवाद धर्मवाद, इलाका वाद  समाज के अन्य हिस्सों की तरह व्याप्त है | कारण यह भी है कि वर्तमान में मजदूरों के लिए कार्य कर रहे सभी मजदूर संगठन जो कुल मिलाकर संगठित क्षेत्र के 90% से अधिक मजदूरों के नेतृत्व का दावा करते हैं चाहे वह ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस जो कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का अनुषंगी संगठन है या इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस जो कांग्रेस का अनुषंगी संगठन है या भारतीय मजदूर सभा जो वर्तमान में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का अनुषंगी संगठन है । सभी संगठनों के नेतृत्व के राजनीतिक और आर्थिक हित इन राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं और फिर यह मजदूर संगठन उन राजनीतिक दलों में फैली हुई बुराइयों को मजदूरों के बीच फैलाने के वाहक बन गए हैं । एक दौर में जब मजदूर नेताओं को खुद को कामरेड कहलाना बहुत पसंद करते थे  और वह कामरेड कहे जाने में गर्व अनुभव करते थे। आज के  मजदूर नेता खुद के नाम के आगे पीछे धर्म सूचक जातिसूचक नामों को जोड़कर गर्व का अनुभव करते हैं और तो और राजनीतिक दलों के साथ अपने रिश्तो को भी गर्व के साथ स्वीकार करते हैं। कोढ़ में खाज यह है कि अब बिरादरी वादी संगठनों जैसे एससी एसटी एसोसिएशन एवं ओबीसी एसोसिएशन के नाम पर ट्रेड यूनियन एसोसिएशन को सरकार ने मान्यता दे दी है और इस एकता को और भी कमजोर कर दिया है  ।  केन्द्रीय श्रम मंत्री श्री संतोष गंगवार के कथनानुसार 2020  श्रम सुधारों का साल होगा । अभी हम केंद्र सरकार के श्रम सुधारों का इंतजार ही कर रहे थे कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कोरोनावायरस के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में नए श्रम सुधारों की घोषणा कर दी । इन सुधारों के अनुसार मध्यप्रदेश में काम के घंटों को 8 घंटे की जगह 12 घंटे का कर दिया गया । नियोक्ता को इसके लिए 4 घंटे का अतिरिक्त भुगतान करना होगा नियोक्ता चाहे तो ड्यूटी रोस्टर भी अपने अनुसार बना सकता है । वर्तमान में कोरोना  संकट के दौर में यह पहला बड़ा श्रम सुधार हैऐसे और बहुत से सुधार होने वाले हैं जो अंततः मजदूर तबकों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेंगे । 

 केंद्र सरकार द्वारा एवं पीछे-पीछे राज्य सरकारों द्वारा कर्मचारियों के महंगाई भत्ते को जुलाई 2021 तक ना देने का निश्चय करने सहित कई तरह के भत्तो  एवं सुविधाओं पर रोक लगाने के कारण उत्पन्न परिस्थितियों का विरोध करने का साहस अपेक्षाकृत मोटी तनख्वाह पाकर खुद को कर्मचारी घोषित कर चुके इस मजदूर में वर्ग में नहीं है। अभी संगठित क्षेत्र के मजदूरों का काम असंगठित क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है इस कारण से कुल मजदूरों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या भी बढ़ रही है | अब जब इन संभावित श्रम सुधारों से असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति असंगठित क्षेत्र केमजदूरों जैसी होती जाएगी । इन परिस्थितियों में यदि मजदूर संगठनों को जिंदा रहना है और मजदूरों के लिए कुछकरने लायक स्थिति में रहना है तो उनको अपने वर्गीय एकता के बारे में सोचना चाहिए और अपनी धार्मिक जातिय पहचान को खोकर अपनी वर्गीय पहचान को पुख्ता करना चाहिए । साथ ही साथ असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिएभी उस लड़ाई में पूरी जगह रखनी चाहिए।  इन संगठनों को राजनीतिक दलों से अपने रिश्तो को भी खत्म ही करना होगा नहीं तो यह राजनीतिक दल इन संगठनों का इस्तेमाल अपने पूंजीपति आकाओं को लाभ पहुंचाने और वर्गीयएकता को नुक्सान पहुंचाने के लिए करते रहेंगे । मजदूर संगठन तभी प्रासंगिक रह सकते हैं ।